विजयादशमी से पहले दिन-रात चल रहा पुतलों का निर्माण
विजयादशमी पर रावण दहन की परंपरा सदियों से चली आ रही है। इस दिन बुराई पर अच्छाई की जीत के प्रतीक के रूप में दशानन रावण के पुतले का दहन किया जाता है। इस बार मंगलवार, 20 अक्टूबर को विजयादशमी मनाई जाएगी। पर्व को लेकर शहर में तैयारियां शुरू हो गई हैं, वहीं कोसमनारा गांव में बंसोड़ परिवार दिन-रात पुतले बनाने में जुटे हुए हैं। कोसमनारा गांव की पहचान अब रावण के पुतलों के निर्माण से भी जुड़ गई है। यहां बंसोड़ समाज के लोग कई वर्षों से इस काम में लगे हुए हैं। पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही इस परंपरा को नई पीढ़ी भी आगे बढ़ा रही है। इन परिवारों के लिए पुतले बनाना केवल आजीविका का साधन नहीं, बल्कि पारंपरिक कला और विरासत को सहेजने का माध्यम भी है।अलग-अलग क्षेत्रों से मिल रहे पुतलों के ऑर्डर
पहले रायगढ़ के रामलीला मैदान में होने वाले रावण दहन के लिए मुख्य रूप से कोसमनारा गांव में ही पुतले तैयार किए जाते थे। अब शहर के साथ आसपास के क्षेत्रों में भी रावण दहन के आयोजन होने लगे हैं। चंद्रपुर, खरसिया और घरघोड़ा सहित आसपास के इलाकों से भी यहां पुतले बनाने के ऑर्डर मिलते हैं। आयोजनों की संख्या बढ़ने से पुतलों की मांग में इजाफा हुआ है। हालांकि, सीमित समय में अलग-अलग आकार के पुतले तैयार करना कारीगर परिवारों के लिए चुनौतीपूर्ण रहता है। विजयादशमी से पहले इन परिवारों को समय पर ऑर्डर पूरा करने के लिए लगातार मेहनत करनी पड़ती है।बड़े पुतले की लागत 75 हजार, छोटे पर 35 हजार रुपये खर्च
समय के साथ रावण के पुतले बनाने की लागत भी बढ़ी है। पहले जहां एक बड़े पुतले को तैयार करने में करीब 50 हजार रुपये खर्च होते थे, वहीं अब इसकी लागत बढ़कर लगभग 75 हजार रुपये तक पहुंच गई है। छोटे पुतले के निर्माण पर भी करीब 35 हजार रुपये खर्च हो रहे हैं। लागत में बढ़ोतरी के बीच पुतले बनाने वाले परिवारों को ऑर्डर समय पर पूरा करने और निर्माण कार्य की व्यवस्था बनाए रखने पर ध्यान देना पड़ता है। बढ़ती मांग के बावजूद इस पारंपरिक काम को जारी रखना उनके लिए मेहनत और समय दोनों की मांग करता है।
