सेवारत डॉक्टरों को हाई कोर्ट से झटका! 36 महीने अध्ययन अवकाश की मांग वाली सभी याचिकाएं खारिज

01_10_2026-highcourtcgnews_m
बिलासपुर। स्नातकोत्तर चिकित्सा शिक्षा के लिए पहले ही 24 महीने का अध्ययन अवकाश ले चुके 15 सेवारत डॉक्टरों को अतिरिक्त 12 महीने का लाभ देने से हाई कोर्ट ने इनकार कर दिया है। जस्टिस बिब्हु दत्ता गुरु ने कहा कि 3 मार्च 2025 का राज्य शासन का आदेश अध्ययन अवकाश की अधिकतम सीमा 36 महीने करता है, लेकिन इसका स्वतः पूर्व प्रभाव नहीं है। पहले से स्वीकृत और लिया जा चुका 24 महीने का अध्ययन अवकाश बाद के आदेश से बढ़ाकर 36 महीने नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने सभी 15 याचिकाएं खारिज कर दीं।

इन याचिकाओं में डा. भूमिक देवानगन (डोंगरगढ़), डा. सरिता मौर्य (जगदलपुर), डा. सुनीति जेम्स (रायपुर), डा. भारती चंद्रा (कोरबा), डा. अनित जेम्स (रायपुर), डा. जगदीश कुमार सिंह (अंबिकापुर), डा. राजनी ठाकुर (रायपुर), डा. नवल कांत जोगी (बिलासपुर), डा. प्रिया पांडेय (भिलाई), डा. आकाश शर्मा (राजनांदगांव), डा. कमल कांत मेश्राम (सिमगा), डा. योगेंद्र सिंह ठाकुर (बालोद), डा. ओमप्रकाश आर्य (कोरबा) और डा. अर्पणा वर्मा (रायपुर) सहित 15 डॉक्टर शामिल हैं।   क्या था विवाद डाक्टरों ने स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के लिए विभाग से अनुमति और अनापत्ति प्रमाणपत्र लेकर 24 महीने का अध्ययन अवकाश लिया था। बाद में 3 मार्च 2025 को शासन ने नियम 44 में छूट देकर अध्ययन अवकाश की अधिकतम अवधि 36 महीने कर दी।   डाक्टरों ने इसी आधार पर पहले के 24 महीने के अध्ययन अवकाश के बाद लिए गए 12 महीने के असाधारण अवकाश को भी अध्ययन अवकाश में बदलने की मांग की।राज्य की ओर से इसका विरोध करते हुए कहा गया कि 3 मार्च 2025 का आदेश बाद में अनुमति लेकर अध्ययन अवकाश लेने वालों पर लागू है। पहले से स्वीकृत और लिया जा चुका अवकाश इससे प्रभावित नहीं होगा। विभाग ने 6 अप्रैल 2026 के पत्र से भी यही स्थिति स्पष्ट की थी। हाई कोर्ट की अहम टिप्पणी कोर्ट ने कहा कि किसी बाद के लाभकारी आदेश को तब तक पूर्व प्रभाव नहीं दिया जा सकता, जब तक उसमें ऐसा स्पष्ट प्रावधान न हो। 3 मार्च 2025 के आदेश में ऐसा कोई स्पष्ट निर्देश नहीं है कि पहले से स्वीकृत 24 महीने का अध्ययन अवकाश स्वतः 36 महीने में बदल जाएगा।   कोर्ट ने यह भी माना कि जिस डॉक्टर को तीन वर्ष का अध्ययन अवकाश पहले ही स्वीकृत किया जा चुका था, उसकी स्थिति इन डॉक्टरों से अलग है। एक मामले में तीन वर्ष का अध्ययन अवकाश देने वाला विभागीय आदेश बाद में रद्द भी हो चुका है, इसलिए उससे समानता का अधिकार नहीं बनता।

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